date 04-09-2015
इंसा हे तू दरिंदा न बन ,
ज़मी पर रख पैर अपने ,
परिंदा न बन ,
यू तो दुनिया बनी हे तुझसे
पर अपनी दुनिया तू अलग चाहता हे,
कम पड़ रही है ज़मी अब तू फलक चाहता है ,
पत्थरों के शहर में जस्बात कहा मिलते है
मिलते हे दो शख़्स ख्यालात कहा मिलते है
क्यों डर लगता हे घरो से निकलने में
क्यों वक़्त लगता है दिलो को पिघलने में
दौलत , शोहरत माना काम की हे बाते ,
मोहब्बत , ईमान भी तो काम ही आते
हर शख्स , हर मजहब तेरे गुलशन का फूल हे
तू चुनिंन्दा न बन ,
इंसा हे तू दरिंदा न बन ,
ज़मी पर रख पैर अपने ,
परिंदा न बन
लोकेन्द्र
इंसा हे तू दरिंदा न बन ,
ज़मी पर रख पैर अपने ,
परिंदा न बन ,
यू तो दुनिया बनी हे तुझसे
पर अपनी दुनिया तू अलग चाहता हे,
कम पड़ रही है ज़मी अब तू फलक चाहता है ,
पत्थरों के शहर में जस्बात कहा मिलते है
मिलते हे दो शख़्स ख्यालात कहा मिलते है
क्यों डर लगता हे घरो से निकलने में
क्यों वक़्त लगता है दिलो को पिघलने में
दौलत , शोहरत माना काम की हे बाते ,
मोहब्बत , ईमान भी तो काम ही आते
हर शख्स , हर मजहब तेरे गुलशन का फूल हे
तू चुनिंन्दा न बन ,
इंसा हे तू दरिंदा न बन ,
ज़मी पर रख पैर अपने ,
परिंदा न बन
लोकेन्द्र
बहुत ही दुःखद घटना जो मानवता के लिए एक सवाल छोड़ गयी हे

No comments:
Post a Comment