Monday, 28 September 2015

नमस्कार मित्रो,  काफी दिनों के बाद खुद से मुखातिब होने का मौका मिला है।  आजकल के परिवेश में सब से मुश्किल हे अपने लिए वक़्त निकलना और खुद से मुखातिब होना जो की बेहद ज़रूरी है। जब ज़िंदगी में दोस्तों का साथ होता हे तब आपकी खूबी गलतियों से  वो आपको मुखातिब करवाते है लेकिन जब दोस्त दूर हो जाये तो खुद को खुद से मिलना पड़ता हे।

दोस्त, ये शब्द को तन्हाई में सोचना आपकी कल्पना आपकी nursary class तक जाएगी  वो समस्त चेहरे आपके सामने आयेगे जिनसे आपने झगडा तो कभी प्यार ,कभी दुलार किया होगा उस वक़्त आपको ये पता ही नहीं था की वो पल जिंदगी की कितनी हसीं यादो में शुमार होगी और इतने सालो बाद भी आपके चेहेरे पर मीठी सी मुस्कान देगी ।  वो तमाम शरारते आपको अकेले में ठहाके लगाने से रोक नहीं पायेगी जो आपने आपके दोस्तों के साथ की होगी .और एक बार दिल कहेगा ज़रूर

       वो दिन पुराने  फिर आजाये और नहीं आ सकें तो वो पुराना यार आ जाये
उम्र कुछ भी होगई हे आज परवाह नहीं , दिल बच्चा बने और बचपन एक बार आजाये

मैने भी अपने उन तमाम दोस्तों के लिए कुछ लिखा था जो जिंदगी के पड़ावों पर फ़तहे करने दुसरे शहर में बस गए थे अब जिंदगी के पड़ावों पर फ़तहे तो हासिल कर ली पर अब जीवन की नयी जिम्मेदारियों को निभाने में व्यस्त है ईश्वरसे यही प्राथर्ना है की वे तरक्की की और अग्रसर रहे , और जिंदगी के हर मोड़ पर मुलाकातो का सिलसिला चलता रहे---

Wednesday, 16 September 2015




      सुख समृद्धि से परिपूर्ण हो जाये परिवेश
      धन धन्य से उज्जवल हो पूर्ण समाज और देश।

      चहुँ दिशाए मंगल गाये  , चहुँ दिशाए आनंद छाए 
          खूब खुशिया लेकर पधारो पधारो  श्री गणेश । 


      
 गणेश चतुर्थी  की आप सभी को शुभकामनाएँ ,
 प्रभु श्री गणेश आपके जीवन में खुशियाँ , समृद्धि लाये

                                                                                           आपका 
                                                                                           लोकेन्द्र 

                                                                                           


     
16-09-2015

दोस्तों  कुछ दिनों से एक ऐसे विषय पर कविता  लिखने का प्रयास कर रहा हूँ जो आस्था एवं संस्कृति से जुड़ा हुआ है, शीर्षक है ,सिंहस्थ २०१६  जो अवंतिका नगरी (उज्जैन ) में आयोजित होगा और पुरे अवंतिका वासी पुरे उल्लास से इस महा पर्व की प्रतीक्षा कर रहे है । 

 सिंहस्थ २०१६ विषय पर लिखने के पूर्व अच्छे अधययन की आवशयकता चित्त को महसूस होती है जो अभी भी जारी है  और आशा करता हूँ आपको ज़रूर पसंद आएगी अभी पूरी लिख नहीं पाया हूँ लिखूँगा तब आपसे ज़रूर शेयर करुगा।   

विषय को सही रूप देने के प्रयास मे  नई कविता का जन्म हुआ कुछ दिनों पहले फेसबुक पर पोस्ट की थी पर ब्लॉग पर पहली बार आपके लिए … 


 आपका
लोकेन्द्र


Friday, 4 September 2015

date 04-09-2015

इंसा हे तू दरिंदा न बन ,
ज़मी पर  रख पैर अपने ,
परिंदा न बन ,
यू तो दुनिया बनी हे तुझसे
पर अपनी दुनिया तू अलग चाहता हे,
कम पड़ रही है ज़मी अब तू फलक चाहता है ,

पत्थरों के शहर में जस्बात कहा मिलते है
मिलते हे दो शख़्स ख्यालात कहा मिलते है

क्यों डर लगता हे घरो से निकलने में
क्यों वक़्त लगता है दिलो को पिघलने में

दौलत , शोहरत माना काम की हे बाते ,
 मोहब्बत , ईमान भी तो काम ही आते

हर शख्स , हर मजहब तेरे गुलशन का फूल हे
तू चुनिंन्दा न बन ,
इंसा हे तू दरिंदा न बन ,

ज़मी पर  रख पैर अपने ,
परिंदा न बन
                                  लोकेन्द्र








बहुत ही दुःखद घटना जो  मानवता के लिए एक सवाल छोड़ गयी हे  





Thursday, 3 September 2015

Date 03-09-2015 Time:6:22 

i welcome my self in world of blog frist time...

abhi tanha hu, kabhi b tanhai mere pass aur me tanhai k paas jayada der ruke nahi he.

kya likhuga, kaise likhuga, abhi socha nahi he, 

but now i write few line of my poem 

ज़िन्दगी एक दरिया है ,बहने तो दीजिये 
हर तूफ़ाँ किनारे पर थमेगा ,इंतज़ार थो कीजिये ,

थोड़े से आँसूओ से ईरादे कहाँ भीगते है , 
बाकी हे कई ख्वाब पूरे होने तो दीजिये 

प्यार के सिवा, जुबा नहीं जानती कुदरत 
बड़ी प्यारी हे ज़िंदगी , प्यार थो कीजिये 

गम तो बहुत से हे ज़माने में,
थोड़ा सा अपने पास भी , रहने थो दीजिये 

 ज़िन्दगी एक दरिया है ,बहने तो दीजिये। 

                                                               आपका 
                                                             "लोकेन्द्र"